असम एनआरसी विवाद: कहां जाएंगे 40 लाख लोग ?

देश के उत्तरपूर्वी राज्य असम में एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का दूसरा और आखिरी ड्राफ्ट सोमवार को जारी कर दिया गया । इसके तहत कुल 3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 348 आवेदनों में से सिर्फ 2 करोड़ 89 लाख 83 हजार 677 लोगों के नाम ही एनआरसी में शामिल किए गए हैं यानी इन्हें ही भारत का नागरिक माना गया है बाकी बचे करीब 40 लाख लोगों की नागरिकता को अवैध करार दे दिया गया है । एनआरसी जारी होने के तुरंत बाद से ही देश की राजनीति में भूचाल सा आ गया । नेताओं की बयानबाजी शुरू हो गई सरकारी नुमाइंदे इसे अपनी जीत बताने लगे वहीं विपक्ष इसे जल्दबाजी वाला फैसला कहने लगा । लेकिन इन सब के बीच एक बात जो सामने आई वो ये कि कांग्रेस एनआरसी का खुले तौर पर विरोध नहीं कर रही है अगर खुल्लमखुल्ला इसका कोई विरोध कर रहा है तो वो हैं टीएमसी अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनका विरोध करना एक तरह से जायज भी है क्योंकि उनका इसमें अपना स्वार्थ है ।

एनआरसी के मुद्दे पर कौन क्या बोला और इससे किसको फायदा मिलेगा ? सरकार का इस पर अपना क्या स्टैंड है ? क्या ये सब अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर हो रहा है ? एनआरसी के राजनीतिक मायने क्या हैं ये सब बताएंगे लेकिन इन सबसे पहले बताते हैं कि आखिर एनआरसी की जरूरत क्यों पड़ी और इसकी शुरुआत कब हुई ? क्या वाकई में 40 लाख लोगों को अब भारत से बाहर निकाल दिया जाएगा ?

क्यों पड़ी एनआरसी की जरूरत ?

असम इकलौता ऐसा राज्य है जहां एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाया जा रहा है । एक अनुमान के मुताबिक असम में करीब 50 लाख बांग्लादेशी गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं इनको लेकर हमेशा से विवाद रहा है । 80 के दशक में गैरकानूनी तरीके से रह रहे बांग्लादेशियों के खिलाफ एक बड़ा स्टूडेंट मूवमेंट हुआ था जिसके बाद असम गण संग्राम परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ जिसमें ये कहा गया कि 25 मार्च 1971 तक जो लोग असम में रह रहे हैं वही लोग वहां के नागरिक माने जाएंगे चाहे वो बांग्लादेशी ही क्यों न हो, बाकी बचे लोगों को अवैध करार दे दिया जाएगा ।

क्या है एनआरसी और कैसे हुई थी इसकी शुरुआत ?

एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर किसी भी राज्य के नागरिकों का कानूनी रिकॉर्ड शीट होता है । आजादी के चार साल बाद साल 1951 में हुई जनगणना के बाद पहला एनआरसी रजिस्टर बना था । इसमें हर गांव में रहने वाले लोगों के नाम, उनकी संख्या, घर और संपत्ति का विवरण था। तब सरकारी आदेश था कि यह डेटा डिप्टी कमिश्नर और सब डिविजनल ऑफिसर्स के पास जमा कराए जाएं । 1960 में एनसीआर डेटा को पुलिस को सौंप दिया गया। साल 1980 में असम में इस डेटा को अपडेट करने की मांग जोर पकड़ने लगी । इस भावना ने 1980 में असम में एक बड़े आंदोलन को जन्म दिया। इस आंदोलन का नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद ने किया। आंदोलनकारियों की मांग थी कि विधानसभा चुनाव से पहले घुसपैठियों का मामला हल किया जाए । 1961 के बाद राज्य में आए लोगों को वापस भेजा जाए या कहीं और बसाए जाए। 1983 के विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य की एक बड़ी आबादी ने मतदान का बहिष्कार किया । बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसको देखते हुए सरकार ने किसी हल तक पहुंचने के लिए बातचीत शुरू की। अगस्त 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच एक समझौता हुआ जिसे असम समझौता के नाम से जाना जाता है।

असम समझौते की अहम बातें

  • 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार मिलेगा।
  • 1961 से 1971 के बीच आने वालों को नागरिकता और बाकी के अधिकार तो दिए जाएंगे लेकिन वोट का अधिकार नहीं दिया जाएगा।
  • 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए लोगों को वापस भेजा जाएगा।

कौन हैं 40 लाख लोग जिनका नाम ड्राफ्ट में नहीं है ?

एनआरसी के राज्य संयोजक प्रतीक हजेला ने बताया कि लोगों के नाम ड्राफ्ट में शामिल न किए जाने की वजह सार्वजनिक नहीं किया जाएगा हां एक रियायत ये दी गई कि जिनका नाम ड्राफ्ट में नहीं है वो लोग एनआरसी सेवा केंद्र जाकर अपने नाम की जानकारी व्यक्तिगत तौर पर ले सकते हैं ।

बता दें कि असम के सिटीजन रजिस्टर में चार कैटेगरी में दर्ज लोगों को शामिल नहीं किया गया। पहले हैं संदिग्ध वोटर, दूसरे हैं संदिग्ध वोटरों के परिवार के लोग, तीसरे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जिनके मामले लंबित हैं और चौथे उनके बच्चे हैं जिनके मामले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल कोर्ट में लंबित हैं ।

40 लाख लोगों के लिए एक मौका बाकी है

फिलहाल 40 लाख लोगों को गृहमंत्रालय की तरफ से राहत दी गई है और बयान जारी कर कहा गया है कि सोमवार को जो एनआरसी जारी किया गया वो सिर्फ ड्राफ्ट है फाइनल लिस्ट नहीं है यानी जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट में नहीं हैं उन्हें विदेशी घोषित नहीं किया जाएगा उन्हें नाम दर्ज कराने का एक और मौका मिलेगा । इसके लिए 2500 ट्रिब्यूनल ऑफिस का गठन किया गया है । बाकी बचे लोगों को 25 मार्च 1971 के पहले की नागरिकता के वैध दस्तावेज पेश करने होंगे । इसके लिए 7 अगस्त से फॉर्म भी मिलेंगे इसके बाद उन्हें अपने दावों को दर्ज कराने के लिए एक और फॉर्म भरना होगा जिसके लिए 30 अगस्त से 28 सितंबर तक की तारीख तय की गई है । फाइनल लिस्ट 31 दिसंबर तक जारी होगी ।

एनआरसी के मुद्दे पर कौन क्या बोला और इससे किसको फायदा मिलेगा ?

एनआरसी का मुद्दा शांत था लेकिन साल 2005 में एक बार फिर इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन हुआ तब कांग्रेस की असम सरकार ने इस पर काम शुरू किया, लेकिन काम में सुस्ती रहने के बाद यह ममाला 2013 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा । असम में पहली बार बीजेपी पूर्ण बहुमत में आई तो इस मांग ने फिर जोर पकड़ा और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नतीजा सामने है । अब फैसला बीजेपी की सरकार में आया है तो जाहिर सी बात है बीजेपी इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी । हालांकि इसकी शुरुआत कांग्रेस की सरकार में हुई थी फिर भी कांग्रेस बीजेपी का खुलकर विरोध नहीं कर पा रही है क्योंकि बीजेपी तुरंत इसे राष्ट्रवाद से जोड़ देगी और कांग्रेस बैकफुट पर आ जाएगी । आज अमित शाह ने संसद में ये बयान देकर अपनी मंशा भी जाहिर कर दी कि आखिर विपक्ष घुसपैठियों को अपने यहां शरण क्यों देना चाहता है ?

राहुल गांधी क्या बोले ?

राहुल गांधी ने बहुत शांतिप्रिय तरीके से बस इतना ही बोला कि एनसीआर की पहल यूपीए सरकार ने 1985 में हुई असम संधि के वादों को पूरा करने के लिए की थी। लेकिन, जिस तरह से केंद्र और असम की भाजपा सरकार ने इस प्रक्रिया को अंजाम दिया है, उसमें काफी कुछ बाकी रह गया है। लोग सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं। जिनके साथ नाइंसाफी हुई है, उन्हें इंसाफ दिलाया जाए।”

ममता क्या बोलीं ?

एनआरसी मामले पर सरकार के खिलाफ सबसे तीखे तेवर ममता बनर्जी के ही हैं । ममता ने साफ शब्दों में कहा कि ये सब सरकार वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कर रही है, जानबूझ कर बिहारियों और बंगालियों को टार्गेट कर रही है । ममता ऐसा इसलिए भी कह रही हैं कि क्योंकि बंगाल यूनिट के बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष बोल चुके हैं कि बंगाल में अगर बीजेपी की सरकार आती है तो वहां भी एनआरसी बनाया जाएगा । ये बात तो सबको पता है कि मुस्लिम ममता के सॉलिड सपोटर माने जाते हैं और बंगाल में 27 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं । बंगाल में करीब 80 लाख तक बांग्लादेशी नागरिक होने का दावा किया जाता रहा है । अगर बंगाल में एनआरसी बनता है तो सीधा सीधा असर ममता बनर्जी के वोट बैंक पर पड़ेगा ।

एनआरसी के राजनीतिक मायने

एनआरसी ड्राफ्ट आने के बाद से ही बीजेपी नेताओं की बयानबाजी शुरू हो गई है । दिलिप घोष ने तो बंगाल में एनआरसी लाने की बात कही ही थी कि अब हैदराबाद के एक विधायक राजा सिंह ने बड़बोलापन दिखाते हुए ये बोल दिया कि अगर बांग्लादेशी अपने देश न लौटें तो उन्हें गोली मार दी जाए खैर ये तो पब्लिसिटी स्टंट का एक हिस्सा है । लेकिन अगर गौर करें तो असम में एनआरसी जारी होने का सीधा फायदा बीजेपी को ही होगा क्योंकि असम में सिर्फ 7 सालों में यानी 1971 से 1978 के बीच मतदाताओं की संख्या में 50 फीसदी का इजाफा हुआ । असम के 25 जिलों में से 14 जिलों में राज्य की औसत जनसंख्या वृद्धि यानी 17 फीसदी से ज्यादा वृद्धि देखी गई है जिसमें से 9 जिले मुस्लिम बहुल हैं । एनआरसी जारी होने के बाद से जाहिर है कि मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या वोट देने से वंचित रह जाएगी । बीजेपी इसे अपनी जीत बता के असम के लोगों की सहानुभूति भी पा लेगी बाकी हिदुत्व के नाम पर वोट लेने का पैंतरा उसे बहुत अच्छे से पता है यानी चित भी बीजेपी की और पट भी ।

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