दिल्ली के बॉस वाली लड़ाई का असली विनर कौन ?

संविधान की धारा 239 (एए) के तहत दिल्ली एक राज्य नहीं बल्कि एक यूनियन टेरिटरी यानी केंद्र शासित प्रदेश है इसलिए इसकी ताकतों को दूसरे राज्यों की ताकतों के बराबर नहीं समझा जा सकता. अब जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है तो केंद्र की बीजेपी और दिल्ली की आम आदमी पार्टी दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं. दिल्ली की शासन प्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केजरीवाल लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं तो बीजेपी कह रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को आइना दिखा दिया. किसकी जीत हुई और कौन आइना देख रहा है, क्या था पूरा विवाद और इस पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया बताते हैं पूरी तफ्तीश से.

क्या है पूरा विवाद ?

वैसे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अपनी सहूलियत और फायदे को देखते हुए समय समय पर करती रही हैं. लेकिन हम यहां बात करेंगे सिर्फ आम आदमी पार्टी की. फरवरी, 2015 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से ही केजरीवाल सरकार उपराज्यपाल के साथ अधिकारों की लड़ाई में उलझी रही है. उस वक्त नजीब जंग दिल्ली के उपराज्यपाल थे तब कुछ नियुक्तियां रद्द करने को लेकर केजरीवाल ने उन्हें केंद्र सरकार का एजेंट बताया था. बाद में उन्होंने जंग की तुलना तानाशाह हिटलर से भी की. दिसंबर, 2016 में दिल्ली अनिल बैजल दिल्ली के उपराज्यपाल बने. फिर भी मामला नहीं सुलझा दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की लड़ाई जारी रही.

केजरीवाल

हाईकोर्ट ने एलजी को ही दिल्ली का बॉस कहा था

4 अगस्त 2016 को दिल्ली होईकोर्ट की तरफ एक फैसला आया था जिसमें कहा गया था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के बॉस हैं यानी उपराज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह और फैसले मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. हाईकोर्ट के फैसले में ये भी कहा गया था कि अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार केंद्र यानी एलजी के पास होगा दिल्ली सरकार के पास नहीं. हाईकोर्ट के इसी फैसले को दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार की ओर से पी चिदंबरम, गोपाल सुब्रमण्यम, राजीव धवन और इंदिरा जयसिंह जैसे वकीलों ने दलील रखी. दिल्ली सरकार की याचिकाओं पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने पिछले साल 2 नवंबर से सुनवाई शुरू की और महज 15 सुनवाई में पूरे मामले को सुनने के बाद 6 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था. अब फैसला आ चुका है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है ?

1- ‘तीन मुद्दों यानी जमीन से जुड़े मामले, कानून व्यवस्था और पुलिस को छोड़कर बाकी सभी मद्दों पर दिल्ली सरकार को शासन करने की शक्ति है.’

2- ‘उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और उसकी राय पर काम करने के लिए बाध्य हैं. फिर भी अगर दोनों के बीच मतभेद हो तो मामला राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है, लेकिन वे ऐसा हर मामले में नहीं कर सकते.’

3- ‘मंत्रिपरिषद को अपने फैसलों की जानकारी एलजी को देनी चाहिए लेकिन उसका मतलब ये नहीं कि उन पर एलजी की सहमति जरूरी है. न किसी की तानाशाही होनी चाहिए, न अराजकता वाला रवैया होना चाहिए.’

4- ‘उपराज्यपाल को मशीनी तरीके से काम करके मंत्रिपरिषद के हर फैसले पर रोक नहीं लगानी चाहिए.’

5- ‘उपराज्यपाल को ये समझना होगा कि मंत्रिपरिषद जनता के प्रति जवाबदेह है. एलजी के सिमित अधिकार हैं इसलिए वो और राज्यों के राज्यपालों के तरह ही हैं.’

केजरीवाल की दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल सकता है. वैसे भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा लेकिन केजरीवाल राजनीतिक स्टंट के तौर पर जब तक सत्ता में रहेंगे अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करते रहेंगे । हां अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर गौर करें तो दिल्ली के बॉस वाली लड़ाई का विनर केजरीवाल को ही माना जाएगा ।

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