जियो इंस्टीट्यूट विवाद: जो अभी है ही नहीं वो श्रेष्ठ कैसे ?

पूरे विवाद की शुरुआत मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर के उस ट्वीट के बाद हुई जब रविवार की शाम उन्होंने कुछ निजी शिक्षण संस्थानों को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस (अग्रणी संस्था) की श्रेणी में चुने जाने के बाद मुबारकबाद दी. खैर प्रकाश जावडेकर जी का ट्वीट नहीं भी आता तो भी ये विवाद होना ही था क्योंकि मुद्दा ही कुछ ऐसा था. मुद्दा दरअसल ये था कि जावडेकर जी ने अपने ट्वीट में मणिपाल यूनिवर्सिटी और बिट्सपिलानी यूनिवर्सिटी के साथ-साथ जियो इंस्टीट्यूट को भी मुबारकबाद दी. इनमें से दो यूनिवर्सिटी के बारे में तो सभी को पता है लेकिन जियो इंस्टीट्यूट जो सिर्फ अभी कागज  पर है उसे बधाई देना लोगों को नागवार गुजरा इसलिए सवाल उठने लगे कि जो संस्थान अभी बना ही नहीं है उसे सरकार ने किस आधार पर इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का तमगा दे दिया. मुद्दा इतना गरम हो गया कि सरकार को आगे आकर इसपर अपनी सफाई पेश करनी पड़ी.

हम बताएंगे कि सरकार ने जियो इंस्टीट्यूट को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस क्यों चुना इस पर विपक्ष ने सरकार को कैसे घेरा और सरकार ने क्या सफाई दी लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का तमगा किन संस्थानों को दिया जाता है और क्यों दिया जाता है इसके लिए नियम और शर्तें क्या हैं और इसमें सरकार की कितनी भागीदारी तय है ?

इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का मतलब और मकसद क्या है ?

अगस्त 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा यूजीसी के ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी रेगुलेशन 2017’ को मंजूरी दी गई थी. इसे लाने का मकसद देश के 10 सरकारी और 10 निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को अलग-अलग सुविधाएं मुहैया कराते हुए विश्वस्तरीय बनाना था क्योंकि शिक्षा संस्थानों की वैश्विक रैंकिग में भारत का प्रतिनिधित्व बेहद कम है या कहें की बहुत नीचे है.

इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस (आईओई) के अधिकार

अगर अधिकारों की बात करें तो और किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की तुलना में आईओई को ज्यादा अधिकार मिले होते हैं. उनकी स्वायत्तता या कहें उनका खुद का अधिकार किसी और संस्थान से कहीं ज्यादा होता है. उदाहण के तौर पर

  • वे भारतीय और विदेशी विद्यार्थियों के लिए अपने हिसाब से फीस तय कर सकते हैं.
  • पाठ्यक्रम और इसके समय के बारे में अपनी सहूलितयत के मुताबिक फैसला ले सकते हैं.
  • उनके किसी विदेशी संस्थान से सहभागिता करने की स्थिति में उन्हें सरकार या यूजीसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ विदेश मंत्रालय द्वारा प्रतिबंधित देशों के संस्थानों से सहभागिता नहीं कर सकेंगे.

इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस में चुने जाने की शर्तें

एक बार आईओई का दर्जा मिल जाने के बाद इनका लक्ष्य 10 सालों के भीतर किसी प्रतिष्ठित विश्व स्तरीय रैंकिंग के टॉप 500 में जगह बनाना होगा. उसके बाद तय सीमा के अंदर टॉप 100 में आना होगा.

विश्व स्तरीय बनने के लिए आईओई दर्जा पाए 10 सरकारी संस्थानों को मानव संसाधन और विकास मंत्रालय की तरफ से स्वायत्तता तो मिलेगी ही, साथ ही हर संस्थान को 1,000 करोड़ रुपए वित्तीय मदद के तौर पर दिए जाएंगे. हां निजी संस्थानों को सरकार की तरफ से किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिलेगी.

आईओई के लिए कौन से संस्थान कर सकते हैं आवेदन ?

इसके लिए केवल उच्च शिक्षण संस्थान ही आवेदन कर सकते हैं, जो या तो ग्लोबल रैंकिंग में टॉप 500 में आए हों या जिन्हें नेशनल इंस्टीट्यूशन रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) में टॉप 50 में जगह मिली हो. इसमें निजी संस्थान भी आईओई दर्जे में ग्रीनफील्ड वेंचर के तहत जगह पा सकते हैं बशर्ते वे प्रायोजक अगले 15 साल के लिए एक ठोस, विश्वसनीय योजना दे सकें.

सरकार ने जियो इंस्टीट्यूट को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस के लिए क्यों चुना ?

प्रकाश जावडेकर के ट्वीट में आईओई दर्जा पाने वाले 6 संस्थान आईआईटी दिल्ली, आईआईटी मुंबई, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलूरु (आईआईएससी), बिट्स पिलानी, मनिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन और जियो इंस्टीट्यूट का नाम है.

खास बात ये है कि जियो इंस्टीट्यूट अभी बना नहीं है केवल प्रस्तावित है इसलिए इसे ग्रीनफील्ड कैटेगरी के तहत चुना गया है. आवेदन के साथ दिए गए प्रपोजल में रिलायंस फाउंडेशन ने मानविकी, इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंसेज, स्पोर्ट्स, कानून, परफॉर्मिंग आर्ट्स, साइंसेज और अर्बन प्लानिंग समेत 50 से ज्यादा विषयों के 10 स्कूल खोलने का प्रस्ताव रखा है. रिलायंस ने ये भी कहा है कि वो टॉप 500 ग्लोबल यूनिवर्सिटी से फैकल्टी लाएंगे, शिक्षकों के लिए आवासीय यूनिवर्सिटी होगी और बाकी सुविधाओं के अलावा 9,500 करोड़ रुपए इंस्टीट्यूट को दिए भी जाएंगे.

सरकार के फैसले पर विपक्ष का हल्लाबोल

 जियो इंस्टीट्यूट को इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद से ही सरकार पर लगातार हमले हो रहे हैं. बात यहां तक आ गई कि विपक्ष ने इसे अंबानी बंधू और प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के करीबी रिश्तों का परिणाम करार दे दिया. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थानों की सूची में डालने की तुलना उद्योगपतियों की कर्जमाफी से कर दी.

येचुरी ने ट्वीट कर कहा, ‘अब तक वजूद में ही नहीं आए विश्वविद्याल को प्रतिष्ठित संस्थान का तमगा देना कॉर्पोरेट जगत के तीन लाख करोड़ रुपए के गैरनिष्पादित कर्ज की तरह है जिसे सरकार ने चार साल में उद्योगपतियों से अपनी मित्रता निभाने के एवज में बट्टेखाते में डाल दिया.’

विपक्ष के अलावा सरकार के इस फैसले का विरोध इतिहासकारों (रामचंद्र गुहा) और शिक्षकों (दिल्ली विद्यालय शिक्षक संघ) ने भी किया.

जियो इंस्टीट्यूट को लेकर उठे सवालों पर सरकार की सफाई

एचआरडी मंत्रालय ने ट्वीट कर उन नियमों का हवाला दिया जिसके तहत निजी संस्थानों को ये दर्जा दिया जा सकता है. इन नियम में संस्था बनाने के लिए जमीन की उपलब्धता, शिक्षित और सक्षम टीम की मौजूदगी, संस्था बनाने के लिये कोष और संस्था बनाने का चरणों में बंटी हुई पूरी योजना होनी चाहिए. इस दिशानिर्देश के मुताबिक तैयार हो रही संस्थाओं से भी आवेदन पत्र दाखिल करने के लिए कहा जा सकता है.

यूजीसी की अधिसूचना के मुताबिक इस दर्जे के लिए आवेदन करने वाले निजी संस्थान को साल 2016 के दिशा निर्देशों के आधार पर सत्यापित किया जाना चाहिए. एचआरडी मंत्रालय का कहना है कि उसे इस श्रेणी में कुल 11 आवेदन प्राप्त हुए थे, जियो ने विशेष दर्जे का संस्थान स्थापित करने के लिए चार दिशानिर्देश पूरे किये हैं जिसके बाद उसे लेटर ऑफ इंटेंट यानी सरकार की सहमति जताने वाला पत्र जारी किया गया है.

एचआरडी मंत्रालय के सचिव सुब्रमण्यम का कहना है कि लेटर ऑफ इंटेंट जारी करने का कतई ये मतलब नहीं है कि जियो इंस्टीट्यूट को विशेष दर्जे वाले संस्थान का टैग दे दिया गया है. उन्होंने बताया कि अगर जियो इंस्टीट्यूट अपने दिए हुए तय सीमा यानी तीन साल के अंदर प्रस्तावित संस्थान विकसित नहीं कर पाया तो उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस वाली श्रेणी से बाहर कर दिया जाएगा.

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