इंसान बनो, हैवान तो सब हैं !

इसे बेशर्मी की हद कहें या जहालत की पराकाष्ठा, कि आज लोग देश में रेप के खिलाफ आवाज उठाने के लिए धर्म को चुनते हैं न कि हालात को । नेता से लेकर मीडिया तक इस फिराक में होते हैं कि रेप मंदिर में हुआ है या मदरसे में । सीधी बात ये है कि जिसके साथ रेप हुआ उसकी और उसके अपनों की जिंदगी से नेता और मीडिया इन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता इनको फर्क पड़ता है तो सिर्फ इस बात से कि रेपिस्ट और पीड़ित में से एक हिंदू है तो दूसरा मुसलमान होना ही चाहिए ।

क्योंकि अगर दोनों एक ही जाति या धर्म के होंगे तो पर्ची छपवाकर किसके खिलाफ कैंडल मार्च निकालेंगे ? टीवी पर प्राइम टाइम में गरमा गरम लहसुन मिर्च का तड़का देकर बहस करके किसकी बजाएंगे ? और तो और ये सोशल मीडिया वाले फेसबुकिया पत्रकार जो एक पैराग्राफ पढ़कर पूरी खबर समझ जाते हैं उनको तीन चार दिन तक अलग-अलग तर्क भी तो पेलने होते हैं ।

ये सारा माजरा तभी तक ही चलता है यानी बस दो-तीन दिन जब तक मीडिया वाले तड़का लगाए रहते हैं । तभी तक सब फुटेज पाने के लिए धरने पर धरना, पोस्टर लेकर कैंडल मार्च, भड़काने वाली एक से बढ़कर एक बाइट और बयान देते हैं । जैसे ही मीडिया छौंका लगाकर मुद्दे को खा जाता है ऐसा लगता है कि पीड़ित को न्याय मिल गया और रेपिस्ट को फांसी । सब टीआरपी का खेल है दोस्तों चाहे वो मीडिया की गरमा गरम बहस हो या नेताओं की हमदर्दी । बाकी हिट होने की इसी रेस में ये गरीब फेसबुकिया पत्रकार भी पड़े रहते हैं ।

समझिए और सोचिए रेप तो हमेशा रेप होता है चाहे वो मंदिर में हो मदरसे में चाहे वो हिंदू करे या मुसलमान । इसलिए हो हल्ला सिर्फ हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मदरसा पर नहीं देश में होने वाले रेप के खिलाफ होना चाहिए लेकिन ऐसा तब तक नहीं होगा जब तक रेप को रेप की नजर से नहीं राजनीति की नजर से देखा जाएगा ।

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