अर्बन नक्सलवाद क्या है ? ये नक्सलवाद से कितना अलग है ?

28 अगस्त यानी मंगलवार को देश कई हिस्सों में छापेमारी और गिरफ्तारी हुई. इसके तहत पांच बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार कर लिया गया. उनकी गिरफ्तारी इस साल जनवरी की शुरुआत में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के सिलसिले में हुई. महाराष्ट्र पुलिस का आरोप है कि ये पांचों लोग पीएम मोदी की हत्या की साजिश में शामिल हैं,

क्या करते हैं वो पांच लोग जिन्हें गिरफ्तार किया गया?

गौतम नवलखा: मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम करते रहे हैं. अंग्रेजी पत्रिका इकनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) में सलाहकार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं.

सुधा भारद्वाज: वकील और ऐक्टिविस्ट हैं. दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं. सुधा ट्रेड यूनियन में भी शामिल हैं और मजदूरों के मुद्दों पर काम करती हैं.

वरवर राव: कवि और लेखक हैं. तेलंगाना के वारंगल जिले के चिन्ना पेंडयाल गांव से ताल्लुक रखते हैं और वामपंथी विचारधारा के समर्थक हैं. वरवर ‘रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन’ के संस्थापक भी हैं.

अरुण फरेरा: मुंबई के बांद्रा में जन्मे अरुण मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. वो अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के आरोपे में चार साल जेल में रह चुके हैं.

वरनॉन गोंजाल्विस: मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंजाल्विस लेखक और कार्यकर्ता हैं. मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते हैं. साल 2007 में उन्हें अनलॉफुल एक्टिविटीज के प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था. 6 साल तक वो जेल में रहे थे.

उन पांचों बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी के बाद से एक टर्म मीडिया में जोर-शोर से सुनाई देने लगा है और वो है ‘अर्बन नक्सलवाद’. आखिर क्या है ये अर्बन नक्सलवाद कहां से आया ये टर्म ये सब आपको बताएंगे लेकिन उसके पहले ये जान लेते हैं कि नक्सलवाद क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और भारत में कहां-कहां इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है ?

नक्सलवाद क्या है ?

देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो सरकार की नीतियों से खुश नहीं होते हैं या फिर जो लोग लंबे समय तक खुद को शोषित महसूस करत रहे हों वो लोग सरकार के खिलाफ दो तरीकों से आवाज उठाते हैं. पहला तरीका है और हम सबके हिसाब से सही तरीका है वो है सत्याग्रह, आंदोलन, अनशन यानी अहिंसा के जरिए और दूसरा तरीका है हथियार उठा लेना जो आज के नक्सलियों का तरीका है.

नक्सलवाद कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्यूनिस्ट आंदोलन की वजह से पैदा हुआ. भारत में ‘नक्सल’ शब्द की उत्पत्ति आज से करीब 50 साल पहले साल 1967 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से हुई जहां भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी.

भारत में नक्सलवाद और उसका प्रभाव

गृह मंत्रायल की तरफ से इस साल अप्रैल में एक रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमें ये कहा गया था कि 2013 के मुकाबले नक्सलवाद में कमी आई है. सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक-

2013 में भारत में कुल 106 जिले नक्सल प्रभावित थे जो 2018 में घटकर 90 हो गए हैं. पहले नक्सल से बुरी तरह प्रभावित जिले 36 थे लेकिन अब 30 हो गए हैं. देश के 11 राज्य नक्सल प्रभावित माने जाते हैं जिनमें तेलंगाना, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र मुख्य हैं. रिपोर्ट में ये बात भी बताई गई है कि 2013 के मुकाबले नक्सलवादी हिंसा में 20 फीसदी की गिरावट आई है और नक्सली हिंसा की वजह से मौतों में 34 फीसदी की कमी आई है.

अब तक आप देश में नक्सलवाद के इतिहास और वर्तमान के बारे में पढ़ रहे थे अब जान लीजिए अर्बन नक्सलवाद क्या है.

अर्बन नक्सलवाद

माओवादियों की एक तरह की रणनीति होती है, जिसमें शहरों में नेतृत्व तलाशने, भीड़ जुटाने, संगठन बनाने और लोगों को इकट्ठा करके उन्हें तमाम चीजों और सामग्रियों के साथ-साथ प्रशिक्षण देने का काम किया जाता है.

2004 में ‘अर्बन पर्सपेक्टिव’ नाम से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का एक एक दस्तावेज आया, जिसमें इस रणनीति की चर्चा की गई थी. ऐसा माना जाता है कि सरकार के खिलाफ हथियार उठाने वाले नक्सली या तो ग्रामीण क्षेत्रों के होते हैं या फिर जंगल में रहते हैं और शहरी इलाकों में बसे वो लोग जो इन नक्सलियों से सहानुभूति रखते हैं उन्हें अर्बन नक्सल कहा जाता है और यही एक बड़ी वजह होती है कि माओवादी नेता अकसर पढ़े-लिखे होते हैं.

अर्बन नक्सलवाद टर्म को फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री से भी जोड़ के देखा गया क्योंकि ‘अर्बन नक्सल्स’ नाम से उन्होंने हाल ही में एक किताब लिखी है.

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